गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

Tolstoy and His Wife - 4.1




अध्याय 4

सुख


1.



यास्नाया पल्याना में नौजवानों का स्वागत “बुआजी” - तात्याना अलेक्सान्द्रोव्ना इर्गोल्स्काया और काउन्ट सिर्गेइ निकोलायेविच टॉल्स्टॉय ने किया.

“प्यारी बुआजी” असल में टॉल्स्टॉय परिवार की दूर की रिश्तेदार थीं, मगर उनके घर में उसका महत्वपूर्ण स्थान था. ल्येव टॉल्स्टॉय की “यादें” में उन्हें और उनके भाग्य को सबसे भावपूर्ण, गर्मजोशी से भरे पृष्ठ समर्पित हैं. वो ल्येव निकोलायेविच के दादा के परिवार में बड़ी हुई, यहाँ उसका प्यार और ममता से पालन पोषण किया गया. जवानी में वो बेहद आकर्षक थी – काले घने, घुंघराले बालों की चोटी, बड़ी-बड़ी, ज़िंदादिल आँखें, निडर, निर्णायक चरित्र और असाधारण भलमनसाहत. इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है, कि ल्येव निकोलायेविच के पिता के दिल में, जो उसके साथ एक ही घर में बड़े हो रहे थे, उसके प्रति नज़ाकतभरे अपनेपन की भावना थी. वह भी उसी तरह प्रत्युत्तर देती थी. इस प्यार का “युद्ध और शांति” में किया गया चित्रण – काउन्ट निकोलाय इल्यिच रस्तोव और सोन्या के बीच संबंधों के माध्यम से - वास्तविकता के काफ़ी निकट है. जैसे वहाँ हुआ, वैसे ही वास्तविकता में भी बेचारी लड़की को ज़्यादा भाग्यवान प्रतिद्वन्द्वी – न ज़्यादा सुंदर और न ज़्यादा जवान राजकुमारी मारिया निकोलायेव्ना वल्कोन्स्काया - के लिए पीछे हटना पड़ा. टॉल्स्टॉय परिवार निर्धन हो चुका था, और राजकुमारी वल्कोन्स्काया के पास काफ़ी संपत्ति थी. तात्याना अलेक्सान्द्रोव्ना इर्गोल्स्काया अपनी प्रतिद्वन्दी  को घर गृहस्थी के कामों में मदद करते हुए उसीके के परिवार में रह गई. आठ साल बाद, पति के लिए पांच बच्चे छोड़कर काउन्टेस मारिया निकोलायेव्ना की मृत्यु हो गई. इर्गोल्स्काया ने मन से उनका पालन-पोषण किया. और छह साल बाद काउन्ट निकोलाय टॉल्स्टॉय ने फिर से उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा. मगर उसके और उसके बच्चों के प्रति अपने “पाक-साफ़ संबंधों को बर्बाद न करने की इच्छा से” उसने इनकार कर दिया और हमेशा कुँआरी ही रही.

तात्याना अलेक्सान्द्रोव्ना इर्गोल्स्काया बड़ी धार्मिक थी, उसे संगीत पसंद था (पियानो बहुत अच्छा बजाती थी) और, टॉल्स्टॉय यकीन दिलाते हैं, कि वह मैडम द’ सिवीन्ये की भांति ख़त लिखती थी.  काउन्ट निकोलाय टॉल्स्टॉय के प्रति अपना सारा प्यार उसने उसके बच्चों पर उंडेल दिया. सबसे ज़्यादा लगाव उसे ल्येव निकोलायेविच के प्रति था और अपने लंबे जीवन के अंतिम वर्ष “पूरी तरह उसे ‘वो ही’ समझती रही, जिसे ज़िंदगी भर प्यार किया था.”

“उसने प्यार को अंतरंग-काम बना लिया था,” टॉल्स्टॉय ने नब्बे के दशक में लिखा, “और इसलिए उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं होती थी. और ये दो गुण – प्यार और धीमापन – अनजाने ही समाज को उसकी ओर आकर्षित करते थे और इस निकटता में एक विशेष आकर्षण पैदा करते थे”.                               
प्यारे ‘लेवच्का’ का पारिवारिक सुख देखना उसके जीवन का सपना था. जब टॉल्स्टॉय कॉकेशस में सेवारत था, तब वे इस बारे में ख़तों में लिखते थे, और ल्येव निकोलायेविच अक्सर उसके ख़त पढ़कर प्यार और स्नेह से रोता था.

समझ सकते हैं, कि कैसी ख़ामोश ख़ुशी से प्यारी वृद्धा ने नौजवानों का स्वागत किया होगा. 
इस बार लेखक का बड़ा भाई – घमंडी, गंभीर, सिर्फ ख़ुद को प्यार करने वाला - काउन्ट सिर्गेइ निकोलायेविच भी बहुत “ख़ुश हुआ”.

जिस जल्दबाज़ी से टॉल्स्टॉय की मांग के अनुसार शादी की तैयारियाँ चल रही थीं, उसे देखते हुए, टॉल्स्टॉय का भाई, जिसे नौजवानों के स्वागत की तैयारी करने के लिए गाँव भेजा गया था, सिर्फ सोफ्या अन्द्रेयेव्ना का कमरा ही तैयार कर पाया था.

पुराना, विशाल घर, जिसमें महान लेखक का जन्म हुआ था, अब अस्तित्व में नहीं था. ये बड़ा (36 कमरों वाला) – महल जैसा, स्तंभों और शानदार सिमेन्ट की त्रिकोणिका वाला घर, मिट्टी के मोल बेच दिया गया था, जब ल्येव निकोलायेविच को समय-समय पर ताश की बड़ी बाज़ी खेलते समय पैसों की ज़रूरत होती थी.        

पुराने ऐश्वर्य की भव्यता से अब सिर्फ दो ही खण्ड शेष बचे थे, जो लुप्त हो चुकी इमारत के पार्श्व का काम देते थे. उनमें से एक में किसानों के बच्चों के लिए स्कूल था. दूसरे खण्ड की दो मंज़िलों में नौजवानों का इंतज़ाम हो गया. शानो-शौकत का ज़रा सा भी नामो-निशान नहीं. सीधा-साधा फर्निचर, लगभग सभी बड़ा कठोर. डाइनिंग टेबल की सेटिंग – मामूली से कुछ बेहतर. प्रकाश – किचन और आम कमरों में चर्बी की मोमबत्तियाँ, “मालिकों के” कमरों में – पामॉलिव के मोमवाली बत्तियाँ और – कभी-कभार ख़ास मौकों के लिए – पामोलिन के लैम्प. गृहस्वामी ने फ़ौरन अपना शानदार सूट उतार दिया और गरम ढीला-ढाला कुर्ता पहन लिया, जो बाद में उसकी इकलौती, पारंपरिक पोषाक बन गई.
उसकी आदतों से युवा पत्नी को अचरज हुआ, जो ज़रा भी ऐश्वर्य के वातावरण में नहीं पली थी. जैसे, उदाहरण के लिए, वह हमेशा गहरे लाल रंग के चौड़े तकिये पर सोता था, जो घोड़ा-गाड़ी की सीट जैसा था, और उस पर खोल भी नहीं चढ़ा होता था. बिस्तरों के पास कालीन भी नहीं होता था, “क्योंकि गरम घरेलू जूते थे”. बाग में – एक भी फूल नहीं, पगडंडियाँ साफ़ नहीं की जाती थीं और घर के चारों ओर – कंटीली झाड़ियाँ, जिन पर नौकर बेदर्दी से हर तरह का कूडा-करकट फेंक दिया करते थे.

घर में थोड़े ही लोग थे. नौकरानी दुन्याशा, नौकर अलेक्सेइ और बूढ़ा रसोइया, जो अक्सर होश में नहीं रहता था.

इस, लगभग गंभीर, बोझिल वातावरण में – फ़ेत के शब्दों में “उड़कर आया एक ख़ूबसूरत पंछी, जिसने अपनी उपस्थिति से सब में जान डाल दी”.

गर्व से लेस और लाल रिबन लगी हुई टोपी पहनकर – जवान काउन्टेस ने आरंभ से ही घर की अधिकारयुक्त और शालीन गृहिणी और “बड़ी मालकिन” बनने की कोशिश की. “ठीक है!” – टॉल्स्टॉय लिखते हैं - “बढ़िया ही है”.

मगर कभी-कभी वह “बड़ी” होने से उकता जाती थी. घर की ख़ामोशी चिड़चिड़ाहट पैदा कर देती. उछल-कूद करने और खिलखिलाने की अदम्य इच्छा होती: वह उछलती, दौड़ती, ये याद करके, कि कैसे छोटी बहन – शैतान की बच्ची- तात्यान्चिक पर गुस्सा करती थी, और चिल्लाकर कहती थी कि उसे “शैतान ले जाए.”

पहले ही दिन से सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने “पति की सहायता” करने की कोशिश की : वह स्कूल जाती, पाठ की निगरानी करती, - “कभी निबंध सुधारती, कभी गणित के सवाल – भाग...” मगर उसे सबसे ज़्यादा पसंद था स्कूल के बच्चों के साथ त्रोयका में घूमना : वे रुक जाते, भागते, गाने गाते और ख़ूब मज़ा लूटते.

उसने दुग्ध-दोहन की तरफ़ भी ध्यान देने की कोशिश की, जब गायों के दुहने का वक्त होता, तो वहाँ चली जाती, मगर टॉल्स्टॉय को आश्चर्य हुआ कि गाय के बाडे की गंध से उसका जी मिचलाता था, और शहर में रहने वाली जवान लड़की गायों के मामले में कुछ न कर सकी...

“बुआजी इतनी ख़ुश हैं,” उसने बहन को लिखा, “सिर्योझा इतना प्यारा है, और लेवच्का  के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं चाहती, मुझे डर लगता है और सकुचाहट भी होती है, कि वह मुझसे इतना प्यार करता है, - तात्यान्का, ऐसा कुछ भी तो नहीं है मुझमें?...”

कभी-कभी वे दोनों मिलकर ख़त लिखते हैं:

ल्येव निकोलायेविच : “तात्याना, प्यारी दोस्त, मुझ पर तरस खाओ, मेरी बीबी – बेवकू-ऊ-फ़ है”.
सोन्या: “वो ख़ुद ही बेवकूफ़ है, तान्या”.
ल्येव निकोलायेविच: “ये ख़बर, कि हम दोनों ही बेवकूफ़ हैं, तुम्हें बहुत दुःख पहुँचायेगी, मगर दुख के बाद सांत्वना भी मिलती है : हम दोनों बहुत ख़ुश हैं, कि हम बेवकूफ़ हैं, और कोई दूसरे नहीं होना चाहते”.
सोन्या: “मगर मैं चाहती हूँ, कि वह बुद्धिमान हो”.
ल्येव निकोलायेविच: “देखा, परेशानी में डाल दिया ना!...क्या तुम महसूस कर सकती हो, कि ऐसा करते हुए, हम कैसे झूलते हुए, ठहाके लगा रहे हैं?…”

छोटे बच्चों की तरह वे एक दूसरे के साथ खेल रहे हैं – और प्यार कर रहे हैं. वे सुखी हैं.

5 जनवरी 1863 को टॉल्स्टॉय अपनी डायरी में लिखते हैं: “मुझे अच्छा लगता है, जब रात में या सुबह, मैं जागता हूँ और देखता हूं : वह मेरी ओर देख रही है और प्यार कर रही है. और कोई नहीं – ख़ासकर मैं – उसके प्यार करने में बाधा नहीं डालता, जैसा वो जानती है, अपने तरीके से. मुझे अच्छा लगता है, जब वह मेरे पास बैठी होती है, और हम जानते हैं, कि एक दूसरे से प्यार करते हैं, जैसा कर सकते हैं; और वह कहेगी : “लेवच्का!”... और रुक जायेगी; “फायरप्लेस की चिमनियाँ सीधी क्यों लगाते हैं?”  या “घोड़ों की उम्र लम्बी क्यों होती है?”… मुझे अच्छा लगता है, जब हम काफ़ी देर तक अकेले होते हैं, और “क्या करना चाहिए?”. “सोन्या, हमें क्या करना चाहिए?” वह मुस्कुराती है. मुझे अच्छा लगता है, जब वह मुझ पर गुस्सा करती है और अचानक, पलक झपकते ही उसके दिमाग़ में ख़याल आता है, और निकलता है ये लब्ज़ – कभी कभी तैश से : “छोड़ो!” “उबाऊ!” एक मिनट बाद वह शर्माते हुए मुस्कुराती है. मुझे अच्छा लगता है, जब वह मेरी तरफ़ नहीं देखती और नहीं जानती कि मैं भी उससे अपने ही तरीके से प्यार करता हूँ. मुझे अच्छा लगता है, जब वह पीली ड्रेस में छोटी बच्ची जैसी दिखती है, और निचला जबडा और जीभ बाहर निकालती है; अच्छा लगता है, जब मैं देखता हूँ पीछे की ओर झुका हुआ उसका सिर, और उसका गंभीर, और भयभीत और बचकाना और भावपूर्ण चेहरा देखता हूँ; मुझे अच्छा लगता है जब ...”

उसका गला रुंध जाता है, अपने आप को रोक नहीं पाता और अपनी प्रसन्नता को काउन्टेस अलेक्सान्द्रा टॉल्स्टाया के साथ बांटता है.

“गाँव से लिख रहा हूँ, लिख रहा हूँ, और ऊपर से बीबी की आवाज़ सुन रहा हूँ, जो भाई से बातें कर रही है और जिसे मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ. अपनी 34 साल की ज़िंदगी में मैं जान ही नहीं पाया कि कोई इस तरह से प्यार कर सकता है और इतना सुखी हो सकता है. जब कुछ शांत हो जाऊँगा तब आपको एक लंबा ख़त लिखूंगा – मतलब ये नहीं, कि ज़्यादा शांत, - मैं अब शांत हूँ, मेरे सामने सब कुछ इतना स्पष्ट है, जैसा ज़िंदगी में कभी नहीं था, – बल्कि जब इसकी काफ़ी आदत हो जाएगी. फ़िलहाल मेरे मन में निरंतर ये भावना रहती है, जैसे मैंने ऐसा सुख चुरा लिया है, जिसके मैं काबिल नहीं हूँ, जिसका मुझे अधिकार नहीं है, जो मेरे लिए नहीं है. वो आ रही है, मैं उसकी आहट सुनता हूँ, और इतना अच्छा लगता है. पिछले ख़त के लिए आपको धन्यवाद. और इसलिए कि इतने अच्छे लोग मुझसे प्यार करते हैं, जैसे आप, और सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक, जैसे ऐसा व्यक्ति, जैसे मेरी पत्नी...”

सन् 1862 में दिसम्बर के मध्य में टॉल्स्टॉय दम्पत्ति कुछ दिनों के लिए मॉस्को गए. पति-पत्नी के बीच के संबंधों पर बाहर के लोगों के अवलोकन में कुछ परिवर्तन महसूस हुआ. पहले जैसी चंचल, सवालिया, प्यार में डूबी नज़रें नहीं थीं. उसकी तरफ़ से नज़ाकत भरी फिक्र थी और पत्नी की तरफ़ से प्यार भरी आज्ञाकारिता. सोफ्या अन्द्रेयेव्ना का उत्साही, स्वच्छन्द स्वभाव फिलहाल पूरी तरह से टॉल्स्टॉय की गरिमा से ढंक गया था: युवा पत्नी अपने महान पति के शब्दों से बोलती थी और उसीके ख़यालों से सोचती थी.

टॉल्स्टॉय दम्पत्ति मॉस्को में कुछ ही हफ़्ते रहे: उन दोनों को वापस, गाँव के एकान्त में लौटने की जल्दी थी. जहाँ वे बिना किसी बाधा के स्वयम् को अपने असाधारण सुख को समर्पित कर सकें.

शादी के साढ़े तीन महीने बाद (5 जनवरी 1863 को) टॉल्स्टॉय अपनी डायरी में लिखते हैं: “पारिवारिक सुख मुझे पूरी तरह अवशोषित कर रहा है...अक्सर मेरे दिमाग़ में आता है, कि सुख और उसके सभी विशिष्ठ गुण गुज़र जाएँगे, मगर उसे कोई नहीं जानता और ना ही जानेगा, और किसी के भी साथ ऐसा ना हुआ है और ना होगा, और मैं इसे महसूस करूंगा...”

मगर “टॉल्स्टॉय दम्पत्ति का “आकर्षक सुखद जीवन” आसपास के लोगों से छुप न सका. सभी को वह मोहित करता था. फेत वृद्धावस्था की ‘यादों’ में दिल को छू लेने वाली नज़ाकत और प्यार से उसका वर्णन करते हैं, और सोफ्या अन्द्रेयेव्ना का एक भाई कहता है: “यास्नाया पल्याना के मेरे आवास के दौरान, मैं ही, शायद, उनके पारिवारिक जीवन का सबसे नज़दीकी गवाह था. इस जोडे की आपसी निकटता, दोस्ती और पारस्परिक प्रेम मेरे लिए हमेशा दाम्पत्य-सुख का उदाहरण और आदर्श रहे. इतना कहना काफ़ी है, कि मेरे माता-पिता, जो अन्य माँ-बाप ही की तरह अपने बच्चों के भाग्य से हमेशा अप्रसन्न रहते हैं, कहते थे: “सोन्या के लिए इससे बेहतर सुख की कामना नहीं की जा सकती!”...

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

Tolstoy and His Wife - 3.7



7

शादी 23 सितम्बर को शाम को आमंत्रितों से खचाखच भरे क्रेमलिन परिसर में स्थित चर्च में हुई. टॉल्स्टॉय गौर करते हैं, कि उनकी वधू का चेहरा रोया हुआ लग रहा था. उसके ‘बेस्ट मैन’ में से एक था पलिवानव. दूल्हे का भाई, काउन्ट सिर्गेइ निकोलायेविच टॉल्स्टॉय नौजवानों के स्वागत की तैयारी करने के लिए यास्नाया पल्याना चला गया.

बधाइयों, शैम्पेन, डॉक्टर बेर्स के घर समारोहपूर्वक आयोजित चाय के बाद सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने गहरी नीली सफ़र की पोषाक पहनी. पिस्टन लगी बड़ी गाड़ी कोचवान सहित पोर्च में खड़ी थी.

रूसी प्रथा के अनुसार, प्रस्थान से पूर्व सब लोग कुछ पलों के लिए ख़ामोश बैठे.

भावपूर्ण बिदाई. नौजवान गाड़ी में बैठ गए. बाहर से, गाड़ी के पीछे – बेर्स परिवार की बूढ़ी नौकरानी वारवरा और टॉल्स्टॉय का आदमी अलेक्सेइ थे. बिदा देने वाले सब लोग पोर्च में थे. आख़िरी चुम्बन, शुभकामनाएँ और भारी-भरकम गाड़ी, टॉल्स्टॉय और उसके सुख को लिए धीरे-धीरे अगली यात्रा पर चल पड़ी. अंधेरा था और ठण्ड भी थी. शिशिर की अप्रिय बारिश हो रही थी.

Tolstoy and His Wife - 3.6




6.



ये “कल” आख़िरकार आ ही गया. 

टॉल्स्टॉय बेर्स के घर शाम को आया. वह काफ़ी परेशान नज़र आ रहा था और कभी पियानो के पीछे बैठता, मगर आरंभ किए हुए मुखड़े को पूरा न बजाकर उठ जाता और कमरे में घूमने लगता, कभी सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के पास जाता और उसे साथ में बजाने को कहता. वह चुपचाप बैठ जाती. मगर उसने बजाना शुरू नहीं किया और बोला:
“बेहतर है, कि इसी तरह बैठे रहें.”

वे पियानो के पीछे एक दूसरे के साथ बैठे, और सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने हौले से वाल्ट्ज़ “Il Baccio” (द किस- अनु.) बजाया और गाने के लिए नोट्स याद करने लगी.
टॉल्स्टॉय की परेशानी, ज़ाहिर है, उसे सकुचा रही थी और अपनी गिरफ़्त में ले रही थी.
“तान्या,” उसने वहाँ से गुज़रती हुए बहन से कहा, “वाल्ट्ज़ गाने की कोशिश कर, मैं शायद, नोट्स भूल गई हूँ.”

तात्याना अन्द्रेयेव्ना कमरे के बीच में खड़ी हो गई और गाने के लिए अपने आप को तैयार करने लगी.

टॉल्स्टॉय के मुख पर कालिमा छा गई: मन की बात कहने का मौका फिर से हाथ से छूटा जा रहा था. मगर जेब में लिखा हुआ ख़त था, जिसे, अगर इस बार भी कह न पाया तो, उसे देने का उसने निश्चय किया था. सोफ़्या अन्द्रेयेव्ना उद्विग्न थी और बहन का साथ ठीक से नहीं दे पा रही थी. पता भी नहीं चला कि कब टॉल्स्टॉय उसकी जगह पर गाने लगा था.

उसने अपने आप से कहा: “अगर वह अंतिम ऊँचा सुर अच्छी तरह पकड़ती है, तो आज ही ख़त दे दूँगा. अगर अच्छी तरह नहीं उठाती, तो नहीं दूँगा.”

तानेच्का तन्मयता से गा रही थी और, अंत तक आते आते, हौले से और निर्णयात्मक ढंग से उसने ऊँचा सुर पकड़ा.
“आप आज कितना अच्छा गा रही हैं!” टॉल्स्टॉय ने उत्तेजित आवाज़ में कहा.

गायिका को चाय बनाने के लिए बुलाया गया.

टॉल्स्टॉय ने, कहने की हिम्मत न जुटाते हुए, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना को ख़त दे दिया.

उसने कहा कि ऊपर, गृहस्वामिनी के कमरे में, जवाब का इंतज़ार करेगा.

सोफ़्या अन्द्रेयेव्ना, “तीर से घायल पंछी” की तरह सहमी हुई, अपने कमरे में भागी और चाभी से द्रवाज़ा बंद कर लिया.                           
उसने पढ़ा:
“सोफ्या अन्द्रेयेव्ना! ये सब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया है. तीन हफ़्तों से मैं रोज़ कह रहा हूँ: आज सब कुछ बता दूँगा,  और दिल में वही पीड़ा, पछतावा, भय और सुख लेकर चला जाता हूँ. और हर रात, जैसे कि अभी भी, मैं अपने विगत को याद कर रहा हूँ, दुखी हो रहा हूँ, और कह रहा हूँ: मैंने क्यों नहीं कहा, और कैसे, और क्या कहा होता. मैं इस ख़त को अपने साथ लिए घूम रहा हूँ, जिससे कि अगर आपसे सब कुछ कहने की हिम्मत न जुटा पाया तो इसे आपको दे दूँ. आपके परिवार में मेरे बारे में ये भ्रामक राय है, जैसा कि मुझे प्रतीत होता है, कि मैं आपकी बहन लीज़ा से प्यार करता हूँ. ये अन्याय है. आपका लघु उपन्यास मेरे दिमाग में बैठ गया है, इसलिए, कि उसे पढ़ने के बाद, मुझे यकीन हो गया है, कि मेरे - दुब्लित्स्की के नसीब में – सुख का सपना देखने का अधिकार नहीं है...कि प्यार के बारे में आपकी बेहतरीन अपेक्षाएँ...कि मैंने उससे ईर्ष्या नहीं की और करूंगा भी नहीं, जिससे आप प्यार करेंगी. मुझे लगता था, कि आपको देखकर मैं बच्चों की तरह खुश हो सकता हूँ. ईवित्सी में मैंने लिखा था : आपकी उपस्थिति मुझे शिद्दत से अपने बुढ़ापे की और सुख की असंभाव्यता की याद दिलाती है, और आप ही...

मगर तब भी, और बाद में भी मैं अपने आप से झूठ बोलता रहा. तब भी, मैं सब कुछ छोड़-छाड़कर वापस अपने रोज़मर्रा के काम और अपने उद्देश्य की मॉनेस्ट्री में जा सकता था. अब मैं कुछ भी नहीं कर सकता, बल्कि ये महसूस कर रहा हूँ, कि मैंने आपके परिवार में उलझन की स्थिति पैदा कर दी है; आपके साथ किसी मित्र जैसे, ईमानदार व्यक्ति जैसे, सीधे-सरल, प्यारे रिश्ते खो गए हैं. और, मैं न जा सकता हूँ, न रुक सकता हूँ. आप ईमानदार इन्सान हैं, दिल पे हाथ रखकर, बिना जल्दबाज़ी किए, ख़ुदा के लिए बिना जल्दबाज़ी किए, बताइए: मैं क्या करूँ, जिसकी हँसी उड़ाते हो, वही तुम्हें मिलता है. मैं हँसी से मर जाता, अगर एक महीना पहले मुझसे कोई कहता, कि जैसे मैं दुख उठा रहा हूँ, उस तरह दुख उठाया जा सकता है, और इस समय मैं सुख से पीड़ा झेल रहा हूँ. बताइये, आप ईमानदार इन्सान हैं, क्या आप मेरी पत्नी बनना चाहती हैं? अगर तहे दिल से चाहती हैं, तभी. आप बहादुरी से कह सकती हैं “हाँ”, अगर आपके दिल में अपने बारे में ज़रा भी संदेह हो तो ”ना” कहना ही बेहतर है. ख़ुदा के लिए, अपने आप से अच्छी तरह पूछिये. “ना” सुनना मेरे लिए भयानक होगा, मगर मैं उसे भाँप जाऊँगा और बर्दाश्त करने की ताकत ढूँढ़ लूँगा. मगर यदि मैं कभी भी उस तरह का पति नहीं बन सकता, उतना प्यारा, जितना प्यार मैं करता हूँ, तो ये भयानक होगा...”

इस ख़त को पढ़ने में दरवाज़े पर पूरी ताकत से हो रही दस्तक ने बाधा डाली.

“सोन्या!” बड़ी बहन करीब-करीब चीख रही थी. “दरवाज़ा खोल, अभ्भी खोल! मुझे तुझसे मिलना है...”
दरवाज़ा थोड़ा सा खुला.
“सोन्या, द’ काउन्ट ने तुझे क्या लिखा है? बोल!” हाथों में ख़त पकडे सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ख़ामोश रही.
“बता, फ़ौरन, द’काउन्ट ने तुझे क्या लिखा है,” हुकुम चलाती हुई आवाज़ में एलिज़ाबेता अन्द्रेयेव्ना उत्तेजना से चीख़ी.
“उसने शादी का प्रस्ताव रखा है,” सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने हौले से जवाब दिया.
“मना कर दे!” हिचकियों भरी आवाज़ में बड़ी बहन कराही, “फ़ौरन मना कर दे!”
सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ख़ामोश रही.

माँ आई, जिसे काफ़ी मुश्किल से इस मुश्किल दृश्य को रोकने में कामयाबी मिली.

और छोटे से ड्राइंग रूम में, जो गृहस्वामिनी के कमरे का एक हिस्सा था, परेशान टॉल्स्टोय खड़ा था और इंतज़ार कर रहा था. उसने अपने हाथ पीछे रखे थे और फ़ायरप्लेस से टिक कर खड़ा था. उसका चेहरा गंभीर था, आँखों में एकाग्रता का भाव था. उसका चेहरा हमेशा से ज़्यादा विवर्ण नज़र आ रहा था.

आख़िरकार हल्के कदमों की आहट सुनाई दी...सोफ्या अन्नद्रेयेव्ना जल्दी से उसके करीब आई. उसने कहा:
“ज़ाहिर है, ‘हाँ’ !”

कुछ मिनट बाद बधाइयों का दौर शुरू हो गया.

बूढ़ा डॉक्टर बीमार था और अपना कमरा बंद करके बैठा था. पत्नी से प्रस्ताव के बारे में सुनकर, पहले तो उसका रुख लगभग शत्रुतापूर्ण रहा. उसे यकीन था कि टॉल्स्टॉय को लीज़ा से प्यार है, और ये भी कि प्यार दोनों तरफ से है, उसे बड़ी बेटी के लिए बेहद अफ़सोस हुआ, और पहले तो वह स्वीकृति भी नहीं देना चाहता था. मगर सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के आँसू और ख़ुद लीज़ा के उदात्त हस्तक्षेप ने जल्दी ही मामला सुलझा दिया. माँ-बाप की स्वीकृति प्राप्त हो गई, और 17 सितम्बर को ल्येव निकोलायेविच ने अपनी डायरी में लिखा : “मंगेतर, उपहार, शैम्पेन. लीज़ा दयनीय है और दुखी है; वह मुझसे नफ़रत करती होगी. चुम्बन लेती है.”

टॉल्स्टॉय की ज़िद पर एक सप्ताह बाद शादी करने का फ़ैसला किया गया. भागदौड का समय शुरू हो गया, जिसका सही वर्णन “आन्ना कारेनिना” में किया गया है.

वैसे ल्येव निकोलायेविच की डायरी में (24 सितम्बर को) ये भी लिखा है: “समझ में नहीं आया कि सप्ताह कैसे गुज़र गया. मुझे कुछ याद नहीं है; सिर्फ पियानो के पास वाला चुम्बन और शैतान का अवतरण, फिर उसके विगत से ईर्ष्या, उसके प्यार पर शक और ये ख़याल कि वह ख़ुद को धोखा दे रही है”.

उसने “भय, अविश्वास और भाग जाने की इच्छा” के बारे में भी लिखा है, जिसने शादी वाले दिन उसे दबोच लिया था.

दूसरे स्त्रोतों से कुछ और जानकारी मिलती है.

ल्येव निकोलायेविच ने (जैसे कि ‘आन्ना करेनिना’ में लेविन ने) मंगेतर को अपनी युवावस्था की डायरियाँ दीं. उनमें उसने उसके सभी आकर्षणों, और पतन के बारे में पढ़ा और इन “भयानक” डायरियों पर फूट-फूट कर रो पड़ी.

अन्य विवरण भी थे, जिन्हें लेविन की शादी वाले वर्णन में पुनर्जीवित किया गया है.

जैसे ता.अ. कुज़्मिन्स्काया याद करती हैं: “23 सितम्बर का दिन आया. सुबह, अचानक, अप्रत्याशित रूप से ल्येव निकोलायेविच प्रकट हुआ. वह सीधा हमारे कमरे में आया. लीज़ा घर में नहीं थी, और मैं, उससे ‘नमस्ते’ करके ऊपर चली गई. कुछ समय बाद, मम्मा को देखकर, मैंने उससे कहा, कि ल्येव निकोलायेविच हमारे कमरे में बैठे हैं. उसे बहुत आश्चर्य और अप्रसन्नता हुई : शादी वाले दिन दूल्हे को दुल्हन के घर नहीं आना चाहिए. मम्मा नीचे गई और उसने उन दोनों को गमलों के, सूटकेसों के और बिखरी हुई चीज़ों के बीच में देखा. सोन्या आँसुओं में डूबी थी. मम्मा ने ये जानने की कोशिश्स नहीं की, कि सोन्या क्यों रो रही है; वह ल्येव निकोलायेविच के साथ कडाई से पेश आई, कि वह शादी वाले दिन यहाँ क्यों आया, और इस बात पर अडी रही, कि वह फौरन निकल जाए, जो उसने किया. सोन्या ने मुझे बताया, कि वह पूरी रात नहीं सोया था, कि वह संदेहों के कारण दुखी हो रहा था. वह उससे ये जानने की कोशिश कर रहा था, कि क्या वह वाकई में उससे प्यार करती है, हो सकता है, कि पलिवानव के साथ (जो दुर्भाग्य से ठीक इसी समय मॉस्को आया था) विगत की यादें उसे परेशान कर रही हों, कि अलग हो जाना ज़्यादा ईमानदारी का काम होगा और ज़्यादा अच्छा होगा. और सोन्या ने उसे कितना ही यकीन दिलाने की कोशिश की, मगर वह यकीन नहीं दिला पाई...”

ये विवरण हमें “आन्ना कारेनिना” से परिचित दृश्यों की याद दिलाते हैं. समानता इतनी दूर तक गई है, कि समारोह की कमीज़ का इतिहास भी, जिसके कारण शादी में डेढ़ घंटे की देर हुई थी, लगता है, कि सचमुच में घटित हुआ था. प्रसिद्ध अंग्रेज़ी आलोचक नैथ्यू आर्नाल्ड ने, याद आता है, कि अविश्वास दिखाते हुए कहा था, कि लेखक को इस दृश्य की ज़रूरत क्यों पड़ गई : वास्तव में हो सकता है कि वह हुई हो, या न हुई हो. मगर टॉल्स्टॉय को, लेविन की शादी में अपने जीवन की घटनाओं को पुनर्जीवित करते हुए, ज़ाहिर है, इस छोटी सी घटना को छोड़ना बुरा लग रहा था, जिसने उस समय उसे इतना परेशान और बदहवास कर दिया था.

फिर भी, कीटी और लेविन के संबंधों को टॉल्स्टॉय की प्रेम कहानी की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ये सही है, कि एक रूसी आलोचक (ग्रमेको) ने लेविन को टॉल्स्टॉय का प्रतिरूप बताते हुए “आन्ना कारेनिना” का अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है. मगर ल्येव टॉल्स्टॉय ने न केवल विरोध नहीं किया, बल्कि युवा आलोचक की किताब को उपन्यास का सर्वोत्तम विश्लेषण बताया. मगर लेविन में टॉल्स्टॉय की विद्वत्ता नहीं है और उस लिहाज़ से – स्वीकार करना होगा – वह काफ़ी असहनीय है.
और कीटी के रूप में सोफ्या अन्द्रेयेव्ना का चित्र, टॉल्स्टॉय की आदत के अनुसार, पितृसत्ताक कुलीन परिवार की शानदार प्राचीन फ्रेम में काफ़ी ज़्यादा सजाया गया है, और आम तौर से, हो सकता टॉल्स्टॉय ने वास्तविकता के बजाय अपनी उस समय की आदर्श पत्नी की कल्पना को प्रस्तुत किया हो. दोनों जोडों के परस्पर संबंध भी बिल्कुल भिन्न हैं: अमीर कुलीन राजकुमारी शेर्बात्स्काया, कन्स्तान्तिन लेविन से शादी करने का फ़ैसला सिर्फ दिल की आवाज़ पर ही ले सकती है. मगर डॉक्टर बेर्स की बेटी और प्रसिद्ध, पूरी तरह प्रस्थापित लेखक, काउन्ट ल्येव टॉल्स्टॉय के बीच संबंध काफ़ी उलझे हुए और क्लिष्ट थे.

Tolstoy and His Wife - 10.4

4 28 अक्टूबर को रात में दो बजे के बाद टॉल्स्टॉय की आँख खुल गई. पिछली रातों की ही तरह दरवाज़े खोलने की और सावधान कदमों की आहट सुनाई...