मंगलवार, 5 जून 2018

Tolstoy and His Wife - 9.1





अध्याय 9

और अंधेरे में रोशनी चमकती है.


1


ये शीर्षक था उस नाटक का जिस पर टॉल्स्टॉय नब्बे के दशक और वर्ष 1900 में काम कर रहे थे. पाठक के सामने – ख़ुद लेखक का ही नाटक है – उसके आत्मकथात्मक चरित्र को छुपाने की ज़रा सी भी इच्छा नहीं है. समृद्ध ज़मींदार सरिन्त्सोव का आध्यात्मिक रूप से नया जन्म हुआ है और वह क्राइस्ट की शिक्षा के अनुरूप अपने जीवन को बदलने के लिए उत्सुक है. उसकी पत्नी पारिवारिक सम्पत्ति और उसमें रूढ़ कुलीन परंपराओं की सुरक्षा करती है. वे ल्येव निकोलायेविच और सोफ्या अन्द्रेयेव्ना की बोली में बात करते हैं. सरिन्त्सोव और उसकी पत्नी सिर्फ एक बात में टॉल्स्टॉय दम्पत्ति से भिन्न हैं : नाटक के पात्र अत्यंत नरम और नमनशील हैं. सरिन्त्सोव तो बहुत आसानी से समर्पण कर देता है: परिवार को दुख न पहुँचाने की, आसपास के लोगों के प्रति प्यार की मांग को ख़त्म न करने की इच्छा उसके भीतर बिना किसी संघर्ष के गंभीर कर्तव्य की आज्ञाओं पर विजय प्राप्त कर लेती है.

मगर ये विवरण भी कुछ हद तक टॉल्स्टॉय के अपने अनुभव से मेल खाता है.

सोफ्या अन्द्रेयेव्ना अपनी आत्मकथा में अचरज करती है: “हमारे बीच पतभेद कब शुरू हुए – पता नहीं, ढूँढ़ नहीं सकती. और किस बात में?...” “उसकी शिक्षा का पालन करने की ताकत मुझमें नहीं थी. हमारे बीच व्यक्तिगत संबंध पहले जैसे ही थे : हम उसी तरह एक दूसरे से प्यार करते रहे, उसी तरह मुश्किल से जुदा होते रहे”. ये परेशानी भरी टिप्पणियाँ ईमानदार और जायज़ हैं. वाकई में, नब्बे के दशक में, उदाहरण के लिए, टॉल्स्टॉय ने पत्नी को 300 पत्र लिखे. ये पत्र मित्रता, फिक्र, चिंता से भरे हुए थे. ये सही है, कि उनमें से अधिकांश में पहले जैसी तप्त भावनाओं के आवेग नहीं मिलते. मगर इस लिहाज़ से भी थोड़े बहुत अपवाद तो थे.

25 अक्टूबर 1895 को उसने लिखा : “जिस दिन तुम गईं, उसी दिन तुम्हें लिखना चाहता था, प्यारी दोस्त, उस एहसास के ताज़ा प्रभाव में जो मैं अनुभव कर रहा था, मगर डेढ़ दिन गुज़र गया, और सिर्फ आज तुम्हें लिख रहा हूँ. वो एहसास, जो मैं अनुभव कर रहा था, बड़ा अजीब सा प्यार, दयनीयता, तुम्हारे प्रति एकदम नया प्यार, ऐसा प्यार, जिसके प्रभाव में मैं अपनी आत्मा से पूरी तरह तुममें समा गया, और वही महसूस कर रहा था, जो तुम कर रही थीं. ये इतना पवित्र, अच्छा एहसास था, जिसके बारे में कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी, हाँ, मुझे मालूम है, कि तुम्हें ये सुनकर ख़ुशी होगी, और मालूम है, कि इसलिए भी, कि मैं उसे कहूँगा, वो बदलेगा नहीं. उलटे, तुम्हें लिखना शुरू करके भी वैसा ही महसूस कर रहा हूँ. अजीब है हमारा ये ख़याल, जैसे शाम का धुंधलका हो. सिर्फ कभी कभी मुझसे तुम्हारी और तुमसे मेरी असहमति के छोटे-छोटे बादल इस प्रकाश को कम कर रहे हैं. मुझे यकीन है, कि रात होने से पहले वे छट जायेंगे, और सूर्यास्त बिल्कुल साफ़ और प्रकाशमान होगा…”

ये था – शिशिर के अंत में.

अगला बसंत आया, मई का महीना आया, और टॉल्स्टॉय पत्नी को और भी ज़्यादा नज़ाकत भरा ख़त लिखता है, उससे विनती करते हुए: “अकेले ही पढ़ना”.

“तुम्हारा सफ़र कैसा रहा और अब तुम कैसी हो, प्यारी दोस्त? अपने आगमन से तुमने इतना गहरा, उत्साहजनक, अच्छा प्रभाव डाला, मेरे लिए बहुत ही अच्छा, क्योंकि, मुझे तुम्हारी कमी बेहद महसूस हो रही थी. मेरा जागना और तुम्हारा प्रकट होना – मेरे लिए सबसे गहरा, ख़ुशनुमा एहसास है, जिसे मैंने महसूस किया है, और वो भी 69 साल की उम्र में 53 साल की औरत के कारण!...”

बुढ़ापे के एहसास वाला ये बसन्त ख़ास परिस्थितियों में आया था. फरवरी 1895 के अंत में लाल बुखार से टॉल्स्टॉय दम्पती के सात साल के बेटे – वानेच्का की मृत्यु हो गई. पिता बेटे से बेहद प्यार करते थे, इस आशा से, कि “उनके बाद वह ख़ुदा का काम जारी रखेगा”. माँ का दुख सांत्वना से परे था.

“बच्चे क्यों मर जाते हैं?” टॉल्स्टॉय पूछता है. “मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, कि हर इन्सान की ज़िंदगी का सिर्फ एक ही मकसद है सिर्फ इतना ही कि अपने भीतर प्यार की भावना को बढ़ाओ, और, अपने भीतर प्यार बढ़ाते हुए, उससे औरों को भी संक्रमित करो, उनके भीतर भी प्यार बढ़ाते हुए...वो (वानेच्का) इसलिए जिया, कि अपने भीतर प्यार बढ़ाए, प्यार में बढ़ता रहे, क्योंकि इसकी उसे ज़रूरत थी, जिसने उसे भेजा था, और इसलिए, कि ज़िंदगी से उसके पास जाते हुए, जो प्यार है, अपने भीतर का पूरा प्यार हमारे भीतर छोड़ जाए, उस प्यार से हमें एक दूसरे से जोड़ दे. हम कभी भी एक दूसरे के इतने करीब नहीं थे, जैसे अभी हैं, और कभी भी, ना तो सोन्या में, ना ही मुझमें प्यार की ऐसी ज़रूरत मुझे महसूस नहीं हुई, और ना ही हर उस चीज़ के प्रति नफ़रत महसूस हुई, जो जुदा करती है, और बुरी है. सोन्या को मैंने इतना प्यार कभी नहीं किया, जितना अब कर रहा हूँ...”

अन्य परिस्थितियाँ भी थीं, जो कभी-कभी पति-पत्नी को एक दूसरे के करीब ले आती थीं.

मगरा ऐसा हमेशा नहीं होता था.

सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के लिए, ज़ाहिर है, संबंध गहरे होते थे, लगभग, सिर्फ एक दूसरे के स्वास्थ्य के प्रति फिक्र से, जुदाई के दिनों में एक दूसरे के प्रति परेशान होने से, ख़तों में नज़ाकत और दोस्ताना प्यार से...ये सब, वाकई में, कभी बदला नहीं.

रोज़मर्रा की कठोर और तीखी नोंक-झोंक, जिन्हें टॉल्स्टॉय के आत्मकथात्मक नाटक में काफ़ी सौम्य कर दिया गया है, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना को दाम्पत्य जीवन में काफ़ी स्वाभाविक प्रतीत होती थी. टॉल्स्टॉय के मन में, इसके विपरीत, ये झगड़े आदत की सामर्थ्य और बचे खुचे प्यार को नष्ट कर रहे थे.

पत्नी के विरोध को वह क्षमा नहीं कर पाया. अगर वो “सत्य” को समझती नहीं थी (समझ नहीं सकती थी या समझना नहीं चाहती थी), तो भी उसे उस पर विश्वास करना चाहिए था और, प्यार की ख़ातिर, उसका अनुसरण करना चाहिए था. वह न केवल ख़ुद उस जीवन पद्धति को जारी रखे हुए थी, जिसकी टॉल्स्टॉय द्वारा निंदा की गई थी, बल्कि, उसकी राय में, बच्चों का भविष्य भी समाप्त कर रही थी. अपने जीवन के सभी विरोधाभासों का ठीकरा वह, तहे दिल से, उसके सिर पर फ़ोड़ना चाहता था. उसकी “नासमझी” के विरोध मे वह कभी-कभी असंयत उपहासों और तानों का प्रयोग करता था. उसकी डायरियों में, मित्रों को लिखे गए ख़तों में, उनसे बातचीत के दौरान ये संकेत, समीक्षाएँ, दोषारोपण फिसल कर आ जाते थे, जो अंशतः पत्नी तक पहुँच जाते थे.

ये सब सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के सामने युद्ध-सदृश्य परिस्थिति खड़ी कर देता था. संकट के क्षणों में वह जिस ज़बर्दस्त ऊर्जा और व्यावहारिक योग्यताओं का प्रदर्शन करती थी, उन्होंने उसके आत्मविश्वास और संयम को बढ़ाने में काफ़ी सहायता की थी. वह स्पष्ट और निश्चित रूप से परिवार की मुखिया बन गई थी. टॉल्स्टॉय अपनी बात पर न तो अड़ा रह सकता था, ना ही घर छोड़ कर जा सकता था. वह अपने आप को पूर्णतः दोषी पाता था: सबसे पहले अपने ही सामने, अपनी शिक्ष के सामने, और उसके बाद परिवार के भी सामने, जिसकी ज़रूरतों के प्रति वह ठंडा पड़ गया था. उसकी कमज़ोरी पत्नी की जीत बन गई थी. वह टॉल्स्टॉय के आधिकारिक/व्यावसायिक संबंधों में भी दख़ल देने की कोशिश करती थी, ऐसे बयान देती थी, और ऐसे कार्य करती थी, जो टॉल्स्टॉय को अप्रिय प्रतीत हो सकते थे. कभी कभी ये सार्वजनिक बयान उसकी जानकारी के बगैर और उसकी इच्छा के विपरीत भी दिये जाते थे. ऐसे अवसर भी आते थे, जब टॉल्स्टॉय को अप्रिय परिस्थितियों से स्वयम् को अलग कर लेना पड़ता था, जिनमें पत्नी की उद्दण्डता के कारण वह स्वयम् को पाता था.

रविवार, 3 जून 2018

Tolstoy and His Wife - 8.4



4

 
क्रैज़र सनाटा” का आरंभ हुआ था सन् 1887 में. ये शीर्षक आरंभिक मूलपाठ के लिए उचित न होता, क्योंकि उसमें पज़्नीशेव की बीबी को फुसलाने वाला संगीतकार नहीं, बल्कि कलाकार था. पति ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ा था. यह दृश्य, जो सोफ्या अन्द्रेयेव्ना की राय में, ज़ोल्या की शैली में लिखा गया था उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा. उसने टॉल्स्टॉय को यकीन दिलाया, कि ये “घिनौना” है, कि ऐसे दृश्य की कोई आवश्यकता नहीं है, कि पति का प्रतिशोध तो दिलचस्प है, मगर उसके पीछे छिपे कारण का कोई औचित्य नहीं है.

ल्येव निकोलायेविच ने नाराज़गी से इन टिप्पणियों को सुना और त्योरी चढ़ा ली. ऐसा लगा, कि अपने काम में दखल देना उसे अच्छा नहीं लगा.

शायद, इसीलिए उसने शुरू किए गए लघु उपन्यास को बीच ही में छोड़ दिया और इस विषय पर दो वर्ष बाद ही लौटा. टॉल्स्टॉय परिवार में पार्टी थी. मेहमानों के बीच सुप्रसिद्ध कलाकार रेपिन और मशहूर कथा-वाचक और सूत्रधार कलाकार अन्द्रेयेव-बुर्लाक था. टॉल्स्टॉय के बड़े बेटे – काउन्ट सिर्गइ ल्वोविच ने, जो अच्छा संगीतकार था – वॉयलिनवादक लसातो के साथ “कैज़र्स सनाटाबजाया. हमेशा की तरह उसने ल्येव निकोलायेविच को बहुत प्रभावित लिया.                                                      
“चलो, क्रैज़र सनाटा” पेश करते हैं,” उसने रेपिन से कहा. “मैं कहानी लिखूँगा, अन्द्रेयेव-बुर्लाक उसे दर्शकों के सामने पढ़ेगा, और आप इस विषय पर चित्र बनाएँगे, जो, जब अन्द्रेयेव-बुर्लाक मेरा लघु नाटक पढ़ रहे होंगे, स्टेज पर रखा रहेगा.

रेपिन ने कभी भी इस काम को करने की कोशिश नहीं की. अन्द्रेयेव-बुर्लाक की शीघ्र ही मृत्यु हो गई. और टॉल्स्टॉय सन् 1887 की रूपरेखा की ओर मुड़ा, मगर बीबी को फुसलाने वाला व्यक्ति अब कलाकार नहीं, बल्कि संगीतकार बन गया था.

अगस्त 1889 के अंत में लेखक ने यास्नाया पल्याना में अपने मेहमानों के सामने “क्रैज़र सनाटा” पढ़ा. मगर उसमें सुधार जारी रहे.

इस कहानी के साथ भी वही हुआ, जो पिछले कुछ समय से टॉल्स्टॉय की अन्य रचनाओं के साथ हो रहा था: सेन्सर ने प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया, इस बीच कहानी की अनगिनत प्रतियाँ वितरित होती रहीं – लिथोग्राफ़, हेक्टोग्राफ़ और हस्तलिखित आवृतियों में. पीटरबुर्ग और मॉस्को के निजी घरों में मेहमान ख़ास तौर से इस कहानी को सुनने के लिए एकत्रित होते थे, जिसने इतना तूफ़ान खड़ा किया था.                                  

“आप, बेशक, जानते हैं,” आलोचक स्त्राखव ने लेखक को लिखा, “कि पूरी सर्दियाँ इसी के बारे में बात करते रहे और ये, कि “आपका स्वास्थ्य कैसा है?” के बदले आम तौर पर पूछते : “क्या आपने क्रैज़र्स सनाटा पढ़ी?”

कहानी के कलात्मक पक्ष की आलोचना करते हुए स्त्राखव ने महसूस किया, कि इससे दमदार कोई चीज़ टॉल्स्टॉय ने अब तक नहीं लिखी है...और इससे ज़्यादा विषादपूर्ण भी – कुछ नहीं”, - उसने आगे जोड़ा.

अंत में, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने स्वयम्, व्यक्तिगत रूप से, अलेक्सान्द्र III के सम्मुख प्रस्तुत होकर टॉल्स्टॉय की रचनाओं के संकलन में इस कहानी को प्रकाशित करने की अनुमति मांगी. अनेक विनतियों के बाद, स्त्राखव की ज़िद पर, लेखक ने कहानी में प्रसिद्ध अंतभाषण (उपसंहार) जोड़ा.
क्या “क्रैज़र सनाटा” सन् 1887 में टॉल्स्टॉय के व्यक्तिगत जीवन पर टिप्पणी थी?
ल्येव निकोलायेविच की डायरी में ऐसी टिप्पणियाँ मिलती हैं:

“पिछले कुछ समय से जो विचार मैंने प्रकट किये थे, वे मेरे नहीं हैं, बल्कि उन लोगों के हैं, जिन्हें मुझसे आत्मीयता महसूस होती है और जो अपने प्रश्नों से, परेशानियों से, विचारों से, योजनाओं से मुझसे मुख़ातिब हुए थे. तो “क्रैज़र सनाटा” का मुख्य विचार, मतलब, कहिये, भावनाएँ एक ऐसी महिला की, स्लाविक महिला की हैं, जिसने मुझे एक पत्र लिखा था, जिसकी भाषा तो मज़ाकिया थी, मगर विषय काफ़ी गंभीर, लैंगिक मांगों को लेकर महिलाओं के शोषण के बारे में था. फिर वह मेरे पास आई थी और उसने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला था. ये ख़याल, कि मैथ्यू की पंक्ति: “अगर तुम वासना से औरत की तरफ़ देखते हो” इत्यादि का ताल्लुक सिर्फ औरों की बीबियों से नहीं है, बल्कि अपनी बीबी से भी है, मुझे एक अंग्रेज़ द्वारा दिया गया था, जिसने ये लिखा था. और इसी तरह का बहुत कुछ.”

राजकुमार खिल्कोव को टॉल्स्टॉय ने ख़त में लिखा: “मुझे इस बात से बहुत ख़ुशी हुई, कि आपने “क्रैज़र सनाटा” की प्रशंसा की. उसमें प्रदर्शित विचार स्वयम् मेरे लिए भी बहुत विचित्र और अप्रत्याशित थे, जब वे स्पष्ट रूप से मेरे दिमाग़ में आए. कभी कभी मैं ये सोचता था, कि कहीं मेरा नज़रिया इसलिए तो ऐसा नहीं है, क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ. और इसलिए ऐसे लोगों की राय मेरे लिए महत्वपूर्ण है, जैसे आप...”           

ये सारी स्वीकारोक्तियाँ बहुत मूल्यवान हैं. मगर इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा, कि बाद में ख़ुद टॉल्स्टॉय को ही पारिवारिक संबंधों में उस क्रूर, ठण्डी शत्रुता” से आश्चर्य हुआ, जिससे “क्रैज़र सनाटा” व्याप्त है.

सोफ्या अन्द्रेयेव्ना को इस कहानी से नफ़रत थी. उसे ऐसा लगा, कि “क्रैज़र सनाटा” के बहाने से अप्रिय अफ़वाहें फैलने लगी हैं : लोग कहते थे, कि इस कहानी में टॉल्स्टॉय ने उस ईर्ष्या को चित्रित किया है, जिसका अनुभव उसने स्वयम् किया था. काउन्टेस ने फ़ैसला किया, कि उसे “बच्चों की नज़रों में अपनी प्रतिष्ठा को साफ़ करना चाहिए”. उसने आत्मकथात्मक उपन्यास “किसका दोष?” लिखा. करीबी लोगों ने उसे प्रकाशित न करने की सलाह दी. “क्रैज़र सनाटा” से विपरीत, जहाँ पारिवारिक विवादों के लिए पति-पत्नी दोनों को दोष दिया गया है, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के उपन्यास में हर चीज़ के लिए दोषी सिर्फ पति है. उपन्यास का प्रमुख पात्र – राजकुमारी प्रज़रोव्स्की है. उसने तूफ़ानी जोश से बिताई जवानी के बाद, 35 साल की उम्र में अठारह साल की आन्ना से शादी की, जिसके वर्णन में काउन्टेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी. आन्ना एक आदर्श महिला है: पाक-साफ़, चंचल, भली, धार्मिक इत्यादि. राजकुमार प्रज़रोव्स्की, इसके विपरीत, अशिष्ट, कामुक जानवर है. रास्ते में अपनी मंगेतर के पीछे-पीछे जाते हुए, वह ललचाई नज़रों से उसके नितम्बों की ओर देखता, और ख़यालों में उसे विवस्त्र करता. शादी के बाद नौजवान गाड़ी में जा रहे थे, और यहाँ अंधेरे में इस जानवर, राजकुमार प्रज़रोव्स्की ने, जिससे तंबाकू की गंध आ रही थी, वो कर डाला, जिसके बारे में मासूम आन्ना को पहले कुछ मालूम नहीं था और जो उसे घृणित लगा.  पति का वासनायुक्त प्यार आन्ना को बिल्कुल संतोष नहीं दे सका. अब प्रकट होता है क्षयरोगी शौकिया-कलाकार, जिसने आन्ना के पैरों पर अपना निःस्वार्थ प्रेम न्यौछावर कर दिया. ईर्ष्यालु जानवर – पति ने, भयानक गुस्से में, असावधानीवश अपनी पाक-साफ़, निर्दोष बीबी को मार डाला.

चाहे जो हो, “क्रैज़र सनाटा” की मनोदशा और विचार ख़ुद ही अपने आप को प्रकट करते हैं. अगर ये मनोदशा और विचार – कुछ अंशों में गैरों के भी हुए, तो भी उन्हें बरदाश्त करते हुए लेखक के मन पर कुछ न कुछ प्रभाव तो पड़ा ही होगा.

राजकुमार अन्द्रेइ बल्कोन्स्की “युद्ध और शांति” में मृत्यु से कुछ देर पहले अपने मित्र से कहता है:
“आह, मेरी रूह, पिछले कुछ समय से ज़िंदगी मुझे बोझ लग रही थी. मैं देख रहा हूँ, कि मैं बहुत ज़्यादा ही समझने लगा हूँ. मगर ज्ञान के वृक्ष से अच्छाई और बुराई चखना इन्सान के लिए अच्छा नहीं है...”

“क्रैज़र सनाटा” में “बहुत ज़्यादा समझना” अंशतः टॉल्स्टॉय की पत्नी के साथ अंतिम मिलन की प्रतिक्रिया भी हो सकती है.

सन् 1889 में कहानी “शैतान” लिखी गई. लेखक के जीवनकाल में वह प्रकाशित नहीं हुई थी. युवा पत्नी के प्रति नायक की बेवफ़ाई में आत्मकथात्मक तत्वों को खोजना पूरी तरह गलत था. विश्वास के साथ कहा जा सकता है, कि टॉल्स्टॉय पति-पत्नी हमेशा एक दूसरे के प्रति पूरी तरह पाक-साफ़ रहे. सितम्बर 1887 में टॉल्स्टॉय ने बिर्युकव से, जिससे वह स्पष्टता से बात करता था, कहा : “मुझे ये महसूस करने में ख़ुशी हो रही है, कि न तो मेरी तरफ़ से, न ही पत्नी की तरफ़ से ज़रा सी भी बेवफ़ाई नहीं थी, और हमने ईमानदार, पाक-साफ़ पारिवारिक ज़िंदगी गुज़ारी”. 

दूसरी तरफ़, सन् 1901 में सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ने पति की गंभीर बीमारी के दौरान अपनी बहन को लिखा: “कभी-कभी रात में उसके पास बैठती या लेटती हूँ, और इस कदर दिल चाहता है उससे कहने को, कि मेरे लिए वह कितना प्रिय है, और ये कि दुनिया में मैंने किसी से भी इतना प्यार नहीं किया, जितना उससे करती हूँ. कि, अगर बाहरी तौर पर – किसी जुनून की वजह से – मैं उसके सामने कुसूरवार थी, मगर अंदर से, मेरे भीतर, मज़बूती से उसके अकेले के प्रति गंभीर, दृढ़ प्यार बैठा था, और कभी भी, उंगली की एक हरकत से भी, मैंने उसके साथ बेवफ़ाई नहीं की. मगर कुछ भी कहना मना है, उसे परेशान करना मना है, और ख़ुद ही उनचालीस साल के, वाकई में, बेहद सुखी और साफ़-सुथरे वैवाहिक जीवना का लेखा जोखा रखना है, मगर इस अपराध बोध से, कि फिर भी हम एक दूसरे को पूरी तरह से, अंत तक, सुख नहीं दे सके”.

“शैतान” के कथानक में आत्मकथात्मक सामग्री है. इसके बारे में टॉल्स्टॉय ने स्वयम् कहा था. मगर बात हो रही थी सिर्फ शादी से पहले तक एक विवाहित किसान महिला के साथ संबंधों के बारे में. फिर, हो सकता है, कि  कहानी का दूसरा पहलू – आदतन शारीरिक निकटता की शक्ति का – सन् 1887 में टॉल्स्टॉय के पारिवारिक अनुभवों के अनुरूप ही था और ये “क्रैज़र सनाटा” में तीखी प्रतिक्रिया की वजह था.

******

23 सितम्बर 1887 को टॉल्स्टॉय दम्पत्ति ने अपनी शादी की रजत-जयंती मनाई. इस सिलसिले में यास्नाया पल्याना में बहुत सारे मित्र और रिश्तेदार आये थे.

डायरी में पच्चीस साल के अपने पारिवारिक जीवन को टॉल्स्टॉय ने इन शब्दों में सीमित कर दिया: “इससे बेहतर भी हो सकता था”.

शुक्रवार, 1 जून 2018

Tolstoy and His Wife - 8.3




3


सन् 1886 की गर्मियों में टॉल्स्टॉय गाड़ी में घास ला रहा था. गाड़ी की चौखट से उसका पाँव टकरा गया, मगर उसने घाव की ओर ध्यान नहीं दिया और कुछ दिनों तक काम करता रहा. ज़ख़्म से पीप आने लगा, तेज़ बुखार हो गया. टॉल्स्टॉय बिस्तर पर पड़ गया.  डॉक्टर ने परि-अस्थिका की सूजन का निदान किया. खून के संक्रमण का डर था. बीमारी ने ल्येव निकोलायेविच को लम्बे समय तक बिस्तर में रहने पर मजबूर किया. अक्टूबर में अलेक्सान्द्र स्तखोविच आया. राजमहल में ऊँचे ओहदे वाले इस अमीर और उच्च कुलीन आदमी में थियेटर के प्रति अनोखा प्यार था और असाधारण कलात्मक प्रतिभा थी. वह बहुत बढ़िया तरीके से वाचन करता था. मरीज़ का दिल बहलाने के लिए, स्तखोविच ने उसे अस्त्रोव्स्की के नाटक और प्रहसन पढ़कर सुनाए. तीन सप्ताह बाद, अपनी जागीर से पीटरबुर्ग लौटते समय, वह फिर से यास्नाया पल्याना आया. टॉल्स्टॉय ठीक हो रहा था, बैसाखियों पर चलता था और हॉल में आराम कुर्सी पर लेटता था.

“मुझे कितनी ख़ुशी हो रही है, कि आप आये!” उसने मेहमान से कहा. “आपके वाचन ने मुझमें जोश भर दिया. आपके जाने के बाद मैंने नाटक लिखा है.”

ये था “अंधेरे का साम्राज्य”. पिछले कुछ वर्षों में लोगों से संवाद करते हुए टॉल्स्टॉय ने उनकी मानसिकता, प्रकार, भाषा को आत्मसात् कर लिया था. काफ़ी कुछ उसने डायरियों में लिख लिया. इस बीच उसके मित्र, दवीदव ने, जो तूला जिला न्यायालय में अभियोग पक्ष का वकील था, साल भर पहले भ्रूण-हत्या के एक मामले के बारे में बताया था; अपराधी ने – जो किसान था – सार्वजनिक रूप से पश्चात्ताप किया था.

टॉल्स्टॉय ने न केवल विस्तार से ये कहानी लिखी, बल्कि वह दो बार तूला के कारागार में जाकर अपराधी से मिला भी था. अब, बिस्तर में पड़े-पड़े, उसने महसूस किया, कि इस लोक-नाटक के पात्र उसकी कल्पना में भूमिकाएँ निभा रहे हैं. मज़ाक-मजाक में, उसने काम शुरू कर दिया. लिखने में मुश्किल हो रही थी. ज़्यादातर वह डिक्टेशन देता था. अब शांत हो चुकी सोफ्या अन्द्रेयेव्ना ख़ुशी-खुशी लिखती. काफी समय से उसने पति के काम में भाग नहीं लिया था : उसके धार्मिक लेखों का पुनर्लेखन करने से उसने इनकार कर दिया था, ये कहकर कि “रिटायर हो रही हूँ”. अब वह ख़ुशी से उसका डिक्टेशन लेती और पहले की तरह रात में उसका पुनर्लेखन करती. उसने अपनी डायरी में लिखा भी था:

“ल्येव निकोलायेविच पर ध्यान दूँगी, उसके बारे में सावधान रहूँगी, जिससे अपने प्रिय काम के लिए उसकी हिफ़ाज़त कर सकूँ.”

ढाई हफ़्ते बाद नाटक तैयार हो गया. उसे फिर से लिखा गया, और शाम को स्तखोविच ने आमंत्रित किसानों के सामने उसे पढ़ा. करीब चालीस लोग थे. वे चुपचाप सुन रहे थे. सिर्फ टॉल्स्टॉय परिवार का सेवक ही ठहाके लगाकर अपनी ख़ुशी प्रकट कर रहा था.

वाचन ख़त्म हुआ. ल्येव निकोलायेविच ने एक बुज़ुर्ग किसान, अपने प्रिय शिष्य से पूछा, कि नाटक उसे कैसा लगा?
तुमसे कैसे कहूँ, ल्येव निकोलायेविच,” उसने जवाब दिया. “मिकिता पहले तो चतुराई से खेलता रहा...मगर बाद में गड़बड़ कर गया...”

इस ख़तरनाक जवाब ने टॉल्स्टॉय को गहन निराशा के गर्त में धकेल दिया. तभी वह समझा कि साहित्यिक रचना से जो मूलभूत अपेक्षाएँ होती हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण है – लोगों तक उनकी पहुँच हो, और वह लोगों को समझ में आए...

सेन्सर द्वारा नाटक पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया – न सिर्फ थियेटर में मंचन के लिए, बल्कि प्रकाशन के लिए भी.

मगर टॉल्स्टॉय के मित्रों ने अपने सम्पर्कों का उपयोग करने का फ़ैसला किया. स्तखोविच निरंतर बढ़ती हुई कुशलता से पीटरबुर्ग में उच्च समाज के शानदार आगंतुक कक्षों में “अंधेरे के साम्राज्य” का वाचन करता रहा. हर जगह इस वाचन को बेहद सफ़लता मिली. आख़िर 27 जनवरी 1887 को अलेक्सान्द्र III ने नाटक को सुनने की इच्छा प्रकट की. उसी स्तखोविच ने काउन्ट्स वरान्त्सोव के महल में, जहाँ त्सार का पूरा परिवार आया था, नाटक का वाचन किया.

अलेक्सान्द्र III उस मेज़ के पास आया, जिस पर नाटक पड़ा था, उसे हाथ में लिया और स्तखोविच से कहा:
“हफ़्ते भर से ये मेरी मेज़ पर पड़ा है. मैं पढ़ ही नहीं पाया; कृपया, कुछ भी छोड़े बिना पढ़िये.”
वाचन शुरू हुआ. त्सार ने बड़ी लगन से एक विशेष कागज़ पर पात्रों के नाम लिखे. जैसे जैसे कथानक आगे बढ़ता गया, उसका प्रभाव भी बढ़ता गया.

अंकों के बीच के अंतराल में मर्द लोग सिगरेट पीने निकल जाते. नाटक के बारे में अटकलें चलती रहीं. मित्रीच के बारे में त्सार ने कहा:
“सैनिक हमेशा टॉल्स्टॉय की सभी रचनाओं में आश्चर्यजनक ढंग से अच्छा होता है.”

मित्रीच के अन्यूता के साथ वाले दृश्य के बाद महान राजकुमार व्लदीमिर अलेक्सान्द्रोविच ने स्तखोविच से कहा:
“सूरज में भी धब्बे होते हैं, सिर्फ इसी आधार पर मैं स्वयम् को इस दृश्य की बेवफ़ाई की ओर इशारा करने की इजाज़त देता हूँ. औरतों के बारे में मित्रीच के सारे तर्क जायज़ हैं, मगर उन्हें निकोलाएव का सैनिक नहीं, बल्कि स्वयम् काउन्ट टॉल्स्टॉय कह रहा है. ये किसी वृद्धा की किसान कन्या से बातचीत नहीं, बल्कि लम्बे-लम्बे दार्शनिक मोनोलॉग्स (एकालाप) हैं.

त्सार निकट आया.
“तुम सही नहीं हो,” उसने भाई से कहा. “मित्रीच के सारे तर्क लेखक द्वारा सैनिक के मुँह में डाले गए एकालाप नहीं हैं, बल्कि स्वाभाविक संभाषण है; अन्नूश्का अनचाहे ही मित्रीच को इस विषय पर ले आई, और इस रात के भयानक प्रभाव में और उस सबके, जो परदे के पीछे हो रहा है, मित्रीच प्रगट में सोचता है, जैसा औरतों के और उनके दुखद भाग्य के बारे में अपने बोझिल विचार शब्दों के माध्यम से प्रकट करते हुए अक्सर बूढ़े लोग करते हैं... अपनी दस साल की श्रोता की ओर ज़रा भी ध्यान दिए बिना.                                    

पाँचवा अंक ख़त्म होने के बाद त्सार की राय का इंतज़ार करते हुए सब लोग बड़ी देर तक ख़ामोश रहे. आख़िरकार उसकी आवाज़ सुनाई दी:
“अद्भुत चीज़ है!”

और इन दो शब्दों ने सबकी ज़ुबान खोल दी. लोग विश्लेषण करने लगे. चारों तरफ़ से उत्साही चीखें “आश्चर्य, अद्भुत!” सुनाई दे रही थीं...

उच्च समाज में मिली सफ़लताओं के दबाव में सेन्सर कमिटी को पीछे हटना पड़ा. प्रकाशन के लिए अनुमति दे दी गई.

“अंधेरे का साम्राज्य” प्रकाशित होते ही तीन दिनों में उसकी 250,000 प्रतियाँ बिक गईं.

मगर जब नाटक को मंच पर प्रस्तुत किया जाना था, तब टॉल्स्टॉय पर प्रभावशाली प्रतिक्रियावादी टूट पड़े. त्सार के मित्र, “नागरिक” के संपादक, राजकुमार मेश्शेर्स्की ने नाटक की “गंदगी” पर थूका. पबेदानोस्त्सेव ने अत्यंत बुरे पत्र लिखकर त्सार से नाटक पर प्रतिबंध लगाने की मांग की और प्रार्थना की. पात्र बांटे जा चुके थे और उनकी तैयारी हो चुकी थी, सजावट और कॉस्ट्यूम्स बन गये थे. मगर अलेक्सान्द्र III ग्रांड रिहर्सल पर आए और अपने चापलूसों के दबाव में आकर...”अद्भुत चीज़” का प्रदर्शन रोक दिया.

थियेटर में “अंधेरे का साम्राज्य” सन् 1895 से पहले प्रदर्शित नहीं हुआ.

पति के नए सृजन की असाधारण सफ़लता ने सोफ्या अन्द्रेयेव्ना के दिल को छू लिया, भावविभोर होकर उसने उसे लिखा: “मैं तुम्हें इतना ऊँचा उठाना चाहती हूँ, कि लोग ये महसूस करें, कि तुम तक उड़कर पहुँचने के लिए उन्हें भी पंखों की ज़रूरत है, कि तुम्हें पढ़ते हुए वे पिघल जाएँ, कि वो, जो तुम लिखोगे, वो किसी को भी अपमानित न करे, बल्कि लोगों को बेहतर बनाए, और ये, कि तुम्हारी रचनाएँ शाश्वत हों, उनमें लोगों की रुचि सदा बनी रहे”.

ऐसे “रचनात्मकता के फ़ॉर्मूले” पर टॉल्स्टॉय हँसता था. उसे इतनी बड़ी सफ़लता की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी. वह सिर्फ स्वांग जैसा, लोक-नाट्य जैसा, लिखना चाहता था:
“अगर मैं जानता, कि इतना पसंद आएगा,” उसने मज़ाक किया, “तो मैं अच्छा लिखने की कोशिश करता.”              

साहित्यिक रचनाओं की ओर पुनरागमन ने पति-पत्नी को एक दूसरे के निकट आने में काफ़ी सहायता की. सोफ़्या अन्द्रेयेव्ना असाधारण रूप से नर्म और आज्ञाकारी हो गई. उसके द्वारा प्रकाशित किये जा रहे संकलित रचनाओं के XIIवें खण्ड के प्रकाशन के समय टॉल्स्टॉय उन साहित्यिक रचनाओं पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो गया, जिन्हें उसने शुरू किया था और बीच ही में छोड़ दिया था. इस तरह से अंतिम स्वरूप में प्रकाशित हुईं : “खोल्स्तोमेर” (जिसका आरंभ साठ के दशक में ही हो चुका था) और “इवान इल्यिच की मौत”.

सन् 1889 के बसंत के आरंभ में अपने मित्रों के पास गाँव में विश्राम कर रहे टॉल्स्टॉय ने एक हल्का-फुल्का  प्रहसन “चालाकी” लिख डाला. उसकी बड़ी बेटी ने यास्नाया पल्याना में शौकिया प्रदर्शन के लिए पिता से ये प्रहसन मांग लिया. इस तरह “मालिकों के उपक्रम” में उलझ गया टॉल्स्टॉय बहता गया और इस अविश्वसनीय गहमा-गहमी के बीच, जो यास्नाया पल्याना में सन् 1889 के दिसम्बर में हो रही थी, रिहर्सलों के दौरान ही, उसने शीघ्रता से अपनी रूप रेखाओं को अंतिम रूप दे दिया. इस तरह प्रादुर्भाव हुआ “ज्ञान के फलों” का. इस शोको, बेशक, अद्भुत कामयाबी मिली और इसने जनता को सबसे पसंदीदा रूसी कॉमेडी प्रदान की.

31 मार्च 1888 को टॉल्स्टॉय की अंतिम, तेरहवीं संतान – बेटे वानेच्का का जन्म हुआ.


Tolstoy and His Wife - 10.4

4 28 अक्टूबर को रात में दो बजे के बाद टॉल्स्टॉय की आँख खुल गई. पिछली रातों की ही तरह दरवाज़े खोलने की और सावधान कदमों की आहट सुनाई...