सोमवार, 26 मार्च 2018

Tolstoy and His Wife - 2.2





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सन् 1861 के बसंत में बड़ी लड़कियों (लीज़ा और सोन्या) ने मॉस्को विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ पास कर लीं. छोटी लड़की को इसकी ज़रूरत नहीं थी: माता-पिता को उसकी अप्रतिम आवाज़ पर बहुत भरोसा था और वे उसे कन्सर्वेटरी (संगीत विद्यालय) भेजने का सपना देख रहे थे. परीक्षा ने बचपन और जवानी के बीच जैसे एक सीमा-रेखा खींच दी. लड़कियों को लम्बी-लम्बी ड्रेस पहनाई गई और धीरे-धीरे उनका सोसाइटी में प्रवेश करवाया गया. उनमें हरेक का अपना पसन्दीदा डान्स था : लीज़ा को लान्सेर्स काद्रिल पसंद था, सोन्या को – वाल्ट्ज़, तान्या को – माज़ूर्का.

मगर उनके अंतरंग जीवन का विकास, मुख्यतः, घर पर ही हुआ. मेहमाननवाज़ डॉक्टर बेर्स के घर काफ़ी लोग आते थे. शनिवार और इतवार को खाने की मेज़ पर बीस लोग बैठते थे. विशेष अवसरों पर वही “अन्कोव केक” ज़रूर पेश किया जाता था, जो बाद में यास्नाया पल्याना भी गया और ल्येव निकोलायेविच के शब्दों में विशिष्ठ वर्ग की भौतिक समृद्धि और तृप्त जीवन का प्रतीक बन गया. अन्के – मॉस्को विश्वविद्यालय की मेडिसिन फ़ैकल्टी के डीन, और डॉक्टर बेर्स के रिश्तेदार थे, उनका इस घर में अक्सर आना-जाना होता था. उन्होंने इस मीठे केक की रेसिपीगृहस्वामिनी को बताई थी. तबसे यह केक परिवार के विशेष दिनों के लिए एक परंपरा बन गया. 

घर में हमेशा नौजवानों की भीड़ लगी रहती थी. डॉक्टर बेर्स का बड़ा बेटा – अलेक्सान्द्र कैडेट-कोर में पढ़ता था, और छुट्टियों में अपने साथ मित्रों को ले आता था. इसके अलावा बेर्स परिवार में जवान रिश्तेदार भी आते रहते थे. शोरगुल मचाती नौजवानों की ये टोली क्रिसमस और ईस्टर की छुट्टियों में, और अक्सर गर्मियों में हफ़्तों तक पक्रोव्स्कोए (मॉस्को की सीमा पर) के समर-कॉटेज में रहती थी. कुछ नर्सरी जैसे , कुछ मेहमानख़ाने जैसे वातावरण में एक ख़ास, त्यौहारों जैसी खुशी का और सामान्य स्नेह का माहौल रहता था. उसका वर्णन टॉल्स्टॉय ने बड़े शानदार तरीके से “युद्ध और शांति” के उन अध्यायों में किया है, जो पाठक को काउन्ट्स रस्तोवों के जीवन में ले जाते हैं.

सोफ़्या अन्द्रेयेव्ना का पहला प्रशंसक वही स्टूडेन्ट था, जिसने उसका “विकास” करने की कोशिश की थी. ये “निहिलिस्ट” – ज़िंदादिल और तेज़-तर्रार – चष्मा लगाता था, और उसके घने उलझे बाल कंघी से पीछे किये होते थे. मगर व्यावहारिक लड़की ग़रीब बेचारे “टीचर” की आहों के प्रति ठण्डी ही रही. एक बार, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना को, कुछ ले जाने में मदद करते हुए, उस बेकरार लड़के ने उसका हाथ पकड़कर चूम लिया.

“आपकी हिम्मत कैसे हुई?!” नकचढ़ेपन से अपने रूमाल से चूमी हुई जगह को पोंछते हुए वह चीखी.
माँ से बढ़चढ़ कर शिकायतें की गईं. मगर लड़की के बर्ताव में, शायद, धृष्ठता और छिछोरेपन का पुट था.

“लीज़ा से सीखो, वह कैसे अपने आप को संभालकर रखती है. उसके साथ ऐसा नहीं होगा,” गृहस्वामिनी ने नसीहत दी.

“निहिलिस्ट” के स्थान पर प्रकट हुआ ऊँची कक्षा का कैडेट – मित्रोफान पलिवानव. वह काफ़ी अमीर कुलीन घराने का था जिसके दूर दूर तक अच्छे संबंध थे. इस बार सोफ़्या अन्द्रेयेव्ना का दिल उदासीन न रह सका. जब घरेलू थियेटर की रिहर्सल्स में नौजवान उसके हाथों पर अपने होंठ रखता था, तो इस बार उसने नकचढ़ेपन से उन्हें नहीं खींचा...ये मासूम प्यार काफ़ी समय तक चला. कोर्स ख़तम करके पीटरबुर्ग की अकादमी में जाते हुए, पलिवानव ने शादी का प्रस्ताव रखा, उसे स्वीकार भी कर लिया गया, मगर उसने अपनी प्रियतमा से विनती की, कि स्वयम् को आज़ाद समझे और शब्दों के बंधन में जकडा हुआ न समझे. इस बातचीत में काफ़ी बचपना सा था. बड़े लोगों ने नौजवानों के राज़ का सिर्फ अंदाज़ ही लगाया था. छोटी तानेच्का के अपने राज़ थे. मीमि-गुडिया से खेलने के बदले वह अपने चचेरे भाई कुज़्मिन्स्की से, जो एक अनुशासित और अनुभवी वकील था, प्यार के बारे में सपने संजोने लगी – जिसके साथ वह शादी करने चली थी.

मॉस्को के इस मध्यम कुलीन वर्ग की लड़कियों से “जिनके अपने अपने प्यार के किस्से और अपने-अपने शौक थे और थी जवानी की तमाम काव्यात्मकता और मूर्खता” ल्येव टॉल्स्टॉय का उलझनोंभरा विशिष्ठ व्यक्तित्व टकराया. और इस मुलाकात के महान लेखक के जीवन में सर्वाधिक गंभीर परिणाम हुए.

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