बुधवार, 28 मार्च 2018

Tolstoy and His Wife - 3.2



2.


अगले कुछ साल ल्येव निकोलायेविच डॉक्टर बेर्स के यहाँ कभी-कभार ही गया.

मगर सन् 1861 की गर्मियों में वह अपनी दूसरी विदेश यात्रा से मॉस्को लौटा. काम की अधिकता होने पर भी वह कभी-कभी गाँव से मॉस्को भाग जाता था. एक बार किसी कारण से बेर्स परिवार में जाने पर, उनके यहाँ हुए परिवर्तन को देखकर वह चौंक गया: “प्यारी लड़कियाँ” ख़ूबसूरत युवतियाँ बन गई थीं. बड़ी दोनों लड़कियों ने तो अपनी परीक्षाएँ पास कर ली थीं, उन्होंने लम्बी ड्रेस पहनी थी, बालों का स्टाइल बदल दिया था, बाहर जाने लगी थीं. ल्येव निकोलायेविच को उनमें दिलचस्पी महसूस हुई और वह अक्सर उनके यहाँ आने लगा. वह दिन में, शाम को, लंच पर ...कभी भी आ जाता था और जल्दी ही अपना आदमीबन गया. गंभीर स्वभाव की लीज़ा से वह साहित्य के बारे में चर्चा करता, उसे अपने स्कूल के बच्चों के लिए निबंध के विषय देता. (“ल्युथेर के बारे में”, “मोहम्मद के बारे में”), जिन्हें बाद में उसने अपनी पत्रिका के संलग्नक में प्रकाशित किया. भावुक सोन्या के साथ टॉल्स्टॉय टीम बनाकर खेलता था, उसके साथ शतरंज की बाज़ी खेलता, ज़िंदादिली से अपने पसन्दीदा छात्रों के बारे में बताता. “भूत की बच्ची – तात्यान्चिक” के साथ वह स्कूल के बच्चों जैसा पेश आता, उसे अपनी पीठ पर बिठा लेता और कमरों में घुमाता; सवाल देता, कविताएँ याद करने को कहता. कभी-कभी वह सबको (घर वालों को और मेहमानों को) पियानो के इर्द गिर्द इकट्ठा करता, उन्हें रोमान्सऔर प्रार्थना गाना सिखाता... उसने ख़ास तौर से नौजवान तान्या की (उसका पंद्रहवाँ साल चल रहा था) आवाज़ चुनी थी, वह अक्सर उसके साथ गाता, उसके लिए नोट्स लाता और उसे “मैडम विआर्दो” कहता – या, उसकी सदाबहार ख़ुशमिजाज़ी को देखते हुए – “उत्सवमूर्ति” कहता.

कभी कभी ल्येव निकोलायेविच छोटे-छोटे ऑपेरा के विषयों में सुधार करता और नौजवानों को शब्द चुनने को कहता (“जितना ज़्यादा क्लिष्ट – उतना अच्छा”) और परिचित धुनों पर गाने के लिए कहता.

एक बार वह अपने साथ तुर्गेनेव का लघु उपन्यास “पहला प्यार” लाया और, उसे बहुत बढ़िया तरीके से ज़ोर से पढ़ने के बाद, लड़कियों को नसीहत देते हुए बोला : “सोलह साल के, नौजवान पुत्र का प्यार ही सच्चा प्यार था, जिसे इन्सान ज़िंदगी में सिर्फ एक बार महसूस करता है, और पिता का प्यार – ओछा और घृणित है”.

वह लम्बी सैरों का आयोजन करता, घण्टों तक मॉस्को के दर्शनीय स्थल दिखाता और नौजवानों को पूरी तरह थका देता.

कभी कभी वह नर्सरी या किचन में चला जाता, नौकरों से बतियाता और जल्दी ही सबका प्यारा बन गया.

टॉल्स्टॉय के इस अक्सर आने से लोग कुछ अंदाज़ लगाने लगे. कहने लगे, कि वह बड़ी बहन – लीज़ा से शादी करेगा. ये भी कहते थे, कि जैसे उसने अपनी बहन से कह दिया है : “अगर शादी करूँगा, तो सिर्फ बेर्स की ही किसी लड़की से.”

“ठीक है, तो लीज़ा से शादी कर ले,” काउन्टेस ने जवाब दिया, “सुंदर बीबी होगी : विश्वसनीय, गंभीर, सुसंस्कृत.”

ये बातें बेर्स परिवार तक पहुँचीं. बेशक, माता-पिता इससे बेहतर किसी और की कल्पना ही नहीं कर सकते थे. उनकी बेटी – बिना दहेज के – काउन्टेस, अमीर ज़मीन्दार की बीबी, मशहूर लेखक की पत्नी बन जाएगी. ख़ास तौर से इस विवाह की ख़्वाहिशमंद थी माँ, जिसकी ल्येव निकोलायेविच की बहन से बहुत दोस्ती थी.    

बकवास और अफ़वाहों ने मानो ख़ामोश तबियत और ठण्डी लीज़ा को नींद से जगा दिया. वह सपनों में खो गई, अपने बाह्य रूप पर ज़्यादा ध्यान देने लगी, और धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने उसे पक्का भरोसा दिला दिया, कि “द काउन्ट” (बेर्स के परिवार में टॉल्स्टॉय को इसी नाम से पुकारते थे) – पागलपन की हद तक उसके प्यार में गिरफ़्तार है.

मगर ल्येव निकोलायेविच को अपने आसपास बन रहे माहौल को महसूस करके, जो उसे विशिष्ठ कदम उठाने पर मजबूर कर रहा था, घुटन महसूस होने लगी और उसने सन् 1861 की डायरी में (6 मई को) लिखा: “बेर्स परिवार में दिन तो हंसी-ख़ुशी बीत जाता है, मगर लीज़ा से शादी नहीं कर सकता”, और बाद में (22 सितम्बर को) लिखा: “लीज़ा बेर्स मुझे ललचाती है; मगर ये नहीं होगा. सिर्फ व्यावहारिकता ही काफ़ी नहीं है, और भावनाएँ तो हैं ही नहीं”.

छोटी बहनें उसे ज़्यादा आकर्षित करती थीं – ज़िंदादिली और जवानी के जोश से सराबोर. मगर “तात्यान्चिक” अभी बच्ची ही थी. मगर सोफ्या अन्द्रेयेव्ना उसे सकारात्मक रूप से अपनी ओर खींच रही थी. वह दिन पर दिन अधिकाधिक मोहक होती जा रही थी. उसका प्रशंसक पलिवानव, स्वयम् को वह जिसकी “मंगेतर” समझती थी, अफ़सर बन चुका था और पीटरबुर्ग की फ़ौजी अकादमी में कार्यरत था. वह उसकी याद में खोई रहती, रोती थी, उत्सुकता से चिट्ठियाँ पढ़ती, जो वह उसकी छोटी बहन को भेजा करता था...मगर कुछ समय से उसका स्त्रीसुलभ मन उससे कह रहा था, कि “द काउन्ट” की ख़ास उसीमें दिलचस्पी बढ़ती जा रही है. भविष्य की जगमगाती संभावनाओं के सामने नौजवान अफ़सरवा की याद मद्धिम होकर बुझ गई. ये सही है, कि वह उसे बचपन से जानता था और जैसी थी उसी रूप में पसन्द करता था. मगर काउन्ट टॉल्स्टॉय को जीतना अभी बाकी था...फिर उसकी पसन्द की ऊँचाई पर जमे रहना कितना मुश्किल है!...ऊपर से एक अनजानापन, अनिश्चितता उसे सता रही थी : अगर, अचानक वह ग़लत हो, और वो सामान्य विश्वास, कि टॉल्स्टॉय उसकी बहन से विवाह करना चाहता है, सही साबित हो?...        

उसे पीडा हो रही थी. मगर स्त्रीसुलभ अहंकार और गर्वीले सपनों का पलडा भारी रहा. सावधानीपूर्वक काउन्ट को अपनी ओर आकर्षित करते हुए, कभी भावुक खोयेपन से, कभी शरारत से, स्पष्टता से और ज़िंदादिली से, वह ख़ुद ही इस भावना के अधीन हो गई और लगभग ये स्वीकार करने के लिए तैयार थी, कि उसे पलिवानव से नहीं, बल्कि टॉल्स्टॉय से प्यार है.

फरवरी 1862 में ल्येव निकोलायेविच महसूस कर रहा था, कि उसे “करीब-करीब प्यार हो गया है”. उस समय बेर्स परिवार के साथ उसके संबंध कितने घनिष्ठ थे, ये इस घटना से प्रकट होता है. पिछले कुछ समय से टॉल्स्टॉय ने अपनी जुआ खेलने की आदत पर नियंत्रण रखा था, मगर कभी-कभी बुझी हुई आग पहले ही जैसी शिद्दत से भड़क उठती थी. एक बार वह क्लब में एक मुलाकाती अफ़सर से मिला और चाइनीज़ बिलियार्ड में उससे 1000 रूबल्स हार गया. पैसा चौबीस घण्टे के भीतर चुकाना था. पैसे थे नहीं. टॉल्स्टॉय “रूसी मैसेंजर” के प्रकाशक कत्कोव के पास भागा और उसे अपना अधूरा लघु उपन्यास “कज़ाकी” 1000 रूबल्स में बेच दिया. इस बात का उसने बेर्स परिवार में ज़िक्र किया. सभी को महसूस हुआ, कि उसने बड़े सस्ते में उपन्यास बेचा है. तब ल्येव निकोलायेविच को अपनी हार के बारे में बताना ही पड़ा. युवा लड़कियाँ अपने कमरे में भाग गईं और “काउन्ट” के आचरण के बारे में फूटफूट कर रोने लगीं.

कुछ महीने और बीते. ल्येव निकोलायेविच फिर से क्रेमलिन में प्रकट हुआ. वह उदास था, झुक गया था और बेतहाशा खांस रहा था. उसे कुमीस के इलाज के लिए भेजा गया. मॉस्को से गुज़रते हुए वह बेर्स परिवार में दो किसान-बालकों को लाया था, जिन्हें वह अपने साथ समारा की स्तेपी में ले जा रहा था.

शाम को, जब वह चला गया, सोफ्या अन्द्रेयेव्ना बेहद उदास थी. हमेशा से ज़्यादा देर वह प्रार्थना करती रही.

“सोन्या, क्या तुम काउन्ट से प्यार करती हो?” छोटी बहन ने हौले से उससे पूछा.
“पता नहीं,” लड़की ने फुसफुसाहट से कहा, उसे इस सवाल से अचरज नहीं हुआ था.”आह, तान्या,” कुछ देर रुककर उसने आगे कहा : “उसके दो भाई टी.बी.से मर गए हैं...”

उस रात वह बड़ी देर तक नहीं सोई, बिना आवाज़ किए कुछ फुसफुसाती रही और धीरे-धीरे रोती रही, इस कोशिश में कि बहनों को न जगा दे.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Tolstoy and His Wife - 10.4

4 28 अक्टूबर को रात में दो बजे के बाद टॉल्स्टॉय की आँख खुल गई. पिछली रातों की ही तरह दरवाज़े खोलने की और सावधान कदमों की आहट सुनाई...